औरत की आवाज

aurat ki aawaz



                       मैं एक औरत हूँ। आप ही के ख़यालों से मैंने जाना कि मैं वो हूँ, जिसके बिना तारों की चमक अधूरी है, मैं वो हूँ जिसके बिना सावन की रिमझिम और सुहानापन अधूरा है। मैं ना होती तो बेचारे चाँद की कोई तारीफ ही नहीं करता। मैं अपने आप में सम्पूर्ण हूँ। आदमी हमारे बिना कुछ अधूरा सा है। मैं जननी हूँ। लेकिन हमने कभी घमंड नहीं किया। मैं त्याग करती हूँ। मैं खुद आहत होती हूँ ताकि आदमी का स्वाभिमान बना रहे।
                                     मेरे पास दो चेहरे या दो मुंह नहीं है। मैं जो हूँ, वो हूँ। एक आदमी की तरह नहीं हूँ, जो अपने घर की औरतों से तो पूरा ढके रहने की उम्मीद रखता है और घर के बाहर दूसरी औरतों पर प्यासी नज़रे डालता हुआ, उनका सबकुछ देखना चाहता है। क्या बेटी होना ही हमारा कुसूर है, जिनको ना घर में और ना ही बाहर बराबर का सम्मान मिलता है। हम में हर योग्यता होने के बावजूद विवाह के लिए लड़का मोल चुका कर खरीदना पड़ता है।
               हम स्कूल कॉलेज से घर आये या नौकरी करें तो भी समाज में ,घर मे हमे शक की नज़रों से देखा जाता है। हम पर शक करने वाले और हमारी बार बार अग्नि परीक्षा लेने वाले देश और समाज के लोगों का असली चेहरा क्या है? जब कोई लड़की इनके पास नौकरी के लिए जाये तो उनकी प्यासी नज़रें लड़की को नंगा करना चाहती है। जब लड़की बाजार में अपना सामान खरीद रही है तो ये सम्मान जनक लोग उनको गंदी नज़रों से ऐसे घूरते है कि लड़की सोचने लगती है कि वो सम्मान के लायक ही नहीं है। और अगर किसी भीड़ को भी एक अकेली लड़की मिल जाये तब उसको नोच खसोट कर खाना चाहते है।



                           औरत के चरित्र को आंकने वाले, लांछन लगाने का मौका मिलते ही लांछन लगाने वाले अब तो उमर भी नहीं देखते, चाहे एक साल की ही क्यों ना हो लड़की होनी चाहिए, नोच लो उसको। लड़कियाँ भयभीत होकर अपने आपको इतना छुपा रही है कि वे खुद से भी छिप रही है, खुद अपने आपको नहीं पहचान पा रही। मैं तमाम औरतों और लड़कियों को बोलना चाहती हूँ कि अपना स्वाभिमान कायम रखो, अग्नि परीक्षा की जरूरत हमें नहीं बल्कि इस सभ्य समाज के उन लोगों को है जो औरतों और लड़कियों को सम्मान की नज़र से देखने की बजाय एक वहशी दरिंदे की तरह उनकी टांगो को ,उनके गिरेबान को गंदी नज़रें गड़ा कर देखते है और बेवजह लांछन लगाते रहते है। “Häβëëβ”


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