खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़!



मांझी ,एक गाँव का रहने वाला ग़रीब मजदूर, जिसने दृढ़ संकल्प से एक पहाड़ को, अकेले छोटी सी छेनी ,हथोड़े से चीर कर रास्ता बना दिया ! यक़ीन करना मुश्किल होता है .विरले लोग ऐसे ही होते है कि उनके काम हैरतअंगेज ही होते है .

         उसने ऐसा क्यों किया ? उसकी पत्नी उसको दोपहर का खाना देने के लिए आती थी. भरी दोपहर में गाँव के लिए बाधा बने हुए पहाड़ पर चढ़ कर उसको पार करना पड़ता था. एक दिन वो फिसल गई .बुरी तरह घायल पत्नी को मांझी ,वक़्त पर अस्पताल नहीं पहुंचा सका ,क्योंकि पहाड़ का चक्कर काट कर जाने में अस्पताल 70 किमी. पड़ता था.पत्नी कि मौत हो गई.

      मांझी बहुत प्यार करता था अपनी पत्नी को ,लेकिन उसने उसके ग़म में कोई आत्महत्या नहीं की.उसके पास कोई शक्ति या धन भी नहीं था. उसने पहाड़ को तोड़ कर एक छोटा रास्ता बनाने का दृढ़ निश्चय किया ताकि दुसरे को ऐसी परेशानी ना हो और वक़्त पर अस्पताल पहुँच सके. एक  छोटी सी छेनी हथोड़े का इंतजाम करके वो अपने संकल्प को पूरा करने के लिए 22 साल तक लगातार ऐसा काम में लगा कि पहाड़ को चीर कर रास्ता बना कर ही छोड़ा. कोई मदद नहीं थी उसके पास ,यहाँ तक खाना ,पानी भी नहीं होता था कई बार .

                               अस्पताल पहुँचने के रास्ते को 55 किमी.से घटा कर 15 किमी कर दिया .पूरे गाँव के लोगों कि जिंदगी में आसानी करदी .वाक़ई इस दौर में ये समझ में आना बिल्कुल ही मुश्किल है कि एक आदमी दूसरों के भले के लिए 22 साल तक अकेला पहाड़ खोदता रहा !



है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

                        मांझी की जिन्दगी से बहुत से सबक मिलते है . बिना किसी धन या ताक़त के ,बस अपने संकल्प से इंसान पहाड़ों को चुनौती दे सकता है. सिर्फ़ अपने लिए तो बहुत लोग जीते है ,लेकिन अपनी जिंदगी जीने के साथ ,दूसरों कि जिंदगियों में भी कुछ आसानी कर जाए,ऐसे लोग हमारे रचियता को पसंद होते है .

                            मांझी को  एक छोटी सी छेनी और हथोड़े से पहाड़ को खोदने की कोशिश करते देख कर लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया ,उसको पागल कहा . किसी विद्वान ने कहा है कि जब आप कोई रचनात्मक काम शुरू करते हो और एक वक़्त आने पर लोग आपको पागल कहने लगे तो रुको मत बल्कि खुश हो जाओ कि जरूर आप अब कामयाबी के क़रीब है . वैसे ही मांझी ने अकेले बिना किसी ताक़त के पहाड़ को चीर कर रास्ता बना कर दिखा दिया.

      गुरूदेव टैगोर ने बांग्ला में कहा …

                           “जोदी तोर डाक  शुने केउ ना आसे तोबे एकला चलो रे”.  यानी अगर कोई आपकी आवाज़ का ज़वाब ना दे तो ,अपने तरीक़े से अकेले ही निकल लो रास्ते पर

                                                            . “Häβëëβ”




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